श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 28: द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.28.6 
प्रह्लाद उवाच
न श्रेय: सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा।
इति तात विजानीहि द्वयमेतदसंशयम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद बोले - पिताश्री ! न तो गति ही सर्वदा उत्तम है और न क्षमा ही। इन दोनों के विषय में मेरा निश्चय जान लो, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥6॥
 
Prahlad said – Father! Neither speed is always best nor forgiveness. Know my determination regarding these two, there is no doubt in it. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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