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श्लोक 3.28.6  |
प्रह्लाद उवाच
न श्रेय: सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा।
इति तात विजानीहि द्वयमेतदसंशयम्॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| प्रह्लाद बोले - पिताश्री ! न तो गति ही सर्वदा उत्तम है और न क्षमा ही। इन दोनों के विषय में मेरा निश्चय जान लो, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥6॥ |
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| Prahlad said – Father! Neither speed is always best nor forgiveness. Know my determination regarding these two, there is no doubt in it. 6॥ |
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