श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 28: द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.28.5 
तस्मै प्रोवाच तत् सर्वमेवं पृष्ट: पितामह:।
सर्वनिश्चयवित् प्राज्ञ: संशयं परिपृच्छते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
बलि के ऐसा पूछने पर समस्त तत्त्वों में पारंगत विद्वान पितामह प्रह्लाद ने अपने पौत्र का संदेह दूर करने के लिए उससे यह बात कही ॥5॥
 
When Bali asked this, the learned grandfather Prahlada, who was well versed in all the principles, said this to his grandson in order to clear his doubts. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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