श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 28: द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.28.32 
देशकालौ तु सम्प्रेक्ष्य बलाबलमथात्मन:।
नादेशकाले किंचित् स्याद् देशकालौ प्रतीक्षताम्।
तथा लोकभयाच्चैव क्षन्तव्यमपराधिन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
देश, काल और अपनी शक्ति का विचार करके ही मृदुता (समानीति) का प्रयोग करना चाहिए। अनुपयुक्त स्थान या काल में इसका प्रयोग करने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता; अतः उपयुक्त स्थान और काल की प्रतीक्षा करनी चाहिए। कभी-कभी लोक-भय से अपराधी को क्षमा करना आवश्यक हो जाता है ॥ 32॥
 
Softness (Samaneeti) should be used only after considering the place, time and one's own strength. Nothing can be achieved by using it in an inappropriate place or time; hence one should wait for the appropriate place and time. Sometimes it becomes necessary to pardon the criminal out of fear of the public. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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