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श्लोक 3.28.18  |
मित्रै: सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसाऽऽवृत:।
आप्नोति द्वेष्यतां चैव लोकात् स्वजनतस्तथा॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| उत्तेजना से भरा हुआ मनुष्य अपने मित्रों में ही शत्रुता उत्पन्न कर लेता है और सामान्य लोगों तथा सम्बन्धियों की घृणा का पात्र बन जाता है ॥18॥ |
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| A person filled with excitement creates enmity among his friends and becomes the object of hatred of ordinary people and relatives. ॥18॥ |
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