श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 28: द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद-बलि-संवादका वर्णन—तेज और क्षमाके अवसर  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.28.14 
अथास्य दारानिच्छन्ति परिभूय क्षमावत:।
दाराश्चास्य प्रवर्तन्ते यथाकाममचेतस:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, वे अपने क्षमाशील पतियों की उपेक्षा करके उनकी पत्नियों को भी हड़प लेना चाहती हैं और ऐसे पुरुषों की मूर्ख पत्नियाँ भी अभिमानपूर्ण आचरण करने पर प्रवृत्त हो जाती हैं ॥14॥
 
Not only this, they ignore their forgiving husbands and want to seize their wives too, and the foolish wives of such men also become inclined to behave arrogantly. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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