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श्लोक 3.279.48  |
इत्युक्त्वान्तर्हितो दिव्य: पुरुष: स महाप्रभ:।
विस्मयं जग्मतुश्चोभौ प्रवीरौ रामलक्ष्मणौ॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा कहकर वह महाशक्तिशाली दिव्य पुरुष वहाँ से अन्तर्धान हो गया। वीर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ही उसे देखकर और उससे वार्तालाप करके अत्यन्त विस्मित हो गए। |
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| Saying this, the divine being of immense power disappeared from there. Both the brave Shri Ram and Lakshman were greatly astonished at his sight and conversation. 48. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कबन्धहनने एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कबन्धवधविषयक
दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७९॥ |
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