श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 279: रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.279.47 
एतावच्छक्यमस्माभिर्वक्तुं द्रष्टासि जानकीम्।
ध्रुवं वानरराजस्य विदितो रावणालय:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
मैं तो केवल इतना कह सकता हूँ कि तुम्हें जनकनन्दिनी सीता अवश्य मिलेंगी। वानरराज सुग्रीव को रावण के घर का पता अवश्य मालूम है।'
 
I can only say that you will certainly meet Janakanandini Sita. The monkey king Sugreeva certainly knows the address of Ravana's house.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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