श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 279: रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.279.32 
हरणं चैव वैदेह्या मम चायमुपप्लव:।
राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
विदेहकुमारी का अपहरण, मुझ पर ऐसी असमय विपत्ति आना, तुम्हारा राज्य से निकाला जाना और मेरे पिता का मर जाना - (इस प्रकार विपत्ति पर विपत्ति आना)॥32॥
 
‘The abduction of Videha Kumari, my being afflicted with such untimely calamity, your banishment from the kingdom and the death of my father - (in this manner trouble after trouble is coming)॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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