श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 279: रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.279.25 
ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं व्यपविद्धबृसीमठम्।
विध्वस्तकलशं शून्यं गोमायुशतसंकुलम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् आश्रम में पहुँचकर उसने देखा कि कुशा का दाना बाहर फेंक दिया गया है, झोपड़ी सूनी है, घर खाली है, घड़े टूटे पड़े हैं और सारा आश्रम सैकड़ों सियारों से भर गया है॥ 25॥
 
Thereafter, on reaching the Ashram he saw that the Kusha mat was thrown out, the hut was deserted, the house was empty, the pitchers were broken and the entire Ashram was filled with hundreds of jackals.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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