श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 279: रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.279.11 
अचिरेणातिचक्राम खेचर: खे चरन्निव।
ददर्शाथ पुरीं रम्यां बहुद्वारां मनोरमाम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
रावण पक्षी की भाँति आकाश में विचरण करता हुआ कुछ ही समय में अपना मार्ग तय करके लंका के निकट पहुँच गया। दूर से ही उसे अपनी सुन्दर एवं मनमोहक नगरी दिखाई दी, जो अनेक द्वारों से सुसज्जित थी।
 
Ravana, who travelled in the skies like a bird, covered his path in a short time and reached near Lanka. From a distance, he saw his beautiful and charming city which was decorated with many gates.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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