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mahabharat 3.278.37-38: रावण के ऐसे वचन सुनकर जनक की सुन्दरी कन्या ने कान बंद करके कहा, 'बस, अब ऐसी बातें मत कहो। आकाश तारों समेत फट जाए, पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाए और अग्नि अपनी गर्मी छोड़कर ठंडी हो जाए, परन्तु मैं रघुकुल के पुत्र श्री रामचन्द्रजी को नहीं छोड़ सकती।'   |   mahabharat अध्याय 3.278: मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 278: मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  3.278.37-38 
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी।
पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वच:॥ ३७॥
प्रपतेद् द्यौ: सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत्।
शैत्यमग्निरियान्नाहं त्यजेयं रघुनन्दनम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
रावण के ऐसे वचन सुनकर जनक की सुन्दरी कन्या ने कान बंद करके कहा, 'बस, अब ऐसी बातें मत कहो। आकाश तारों समेत फट जाए, पृथ्वी टुकड़े-टुकड़े हो जाए और अग्नि अपनी गर्मी छोड़कर ठंडी हो जाए, परन्तु मैं रघुकुल के पुत्र श्री रामचन्द्रजी को नहीं छोड़ सकती।'
 
On hearing such words from Ravana, the beautiful daughter of Janaka closed her ears and said to him, 'Enough, don't say such things now. The sky along with the stars may burst, the earth may break into pieces and the fire may give up its heat and become cold, but I cannot leave Shri Ramchandraji, the son of the Raghukul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)