श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 277: श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना  »  श्लोक d1h-39
 
 
श्लोक  3.277.d1h-39 
(श्रीराम उवाच
गच्छ तात प्रजा रक्ष्या: सत्यं रक्षाम्यहं पितु:।)
विसर्जित: स रामेण पितुर्वचनकारिणा।
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं पुरस्कृत्यास्य पादुके॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
उस समय श्री रामचंद्रजी ने कहा - पिता भरत! अयोध्या लौट जाओ। तुम प्रजा की रक्षा करो और मैं अपने पिता के सत्य की रक्षा कर रहा हूँ। ऐसा कहकर पिता की आज्ञा का पालन करने वाले श्री रामचंद्रजी ने (उन्हें समझाकर) विदा किया। फिर (लौटकर) वे अपने बड़े भाई के चरणचिह्नों को सामने रखकर नंदिग्राम में रहने लगे और वहीं से राज्य का कार्य देखने लगे। 39.
 
At that time Shri Ramchandraji said - Father Bharat! Go back to Ayodhya. You should protect the people and I am protecting the truth of my father. Saying this, Shri Ramchandraji, who obeyed his father's orders, (after convincing him) sent him away. Then (on returning) he stayed in Nandigram keeping the footprints of his elder brother in front of him and started looking after the kingdom from there. 39.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)