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mahabharat 3.277.51: इस प्रकार बोलते हुए रावण के कान, नाक और आँखों से आग की चिंगारियाँ निकलने लगीं, जैसे रात्रि में जलते हुए वृक्ष के छिद्रों से लपटें निकलती हैं ॥51॥   |   mahabharat अध्याय 3.277: श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 277: श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.277.51 
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिष:।
निश्चेरुर्दह्यतो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रत:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बोलते हुए रावण के कान, नाक और आँखों से आग की चिंगारियाँ निकलने लगीं, जैसे रात्रि में जलते हुए वृक्ष के छिद्रों से लपटें निकलती हैं ॥51॥
 
While speaking in this manner, sparks of fire began to come out of Ravana's ears, nose and eyes, just as flames come out from the holes in a tree burning at night. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)