| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना » श्लोक 40 |
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| | | | श्लोक 3.275.40  | रावयामास लोकान् यत् तस्माद्रावण उच्यते।
दशग्रीव: कामबलो देवानां भयमादधत्॥ ४०॥ | | | | | | अनुवाद | | उसने समस्त लोकों को रुलाया, इसलिए रावण कहलाया। राक्षस की शक्ति उसकी इच्छानुसार बढ़ती गई, इसलिए वह देवताओं को सदैव भयभीत रखता था। | | | | He made all the worlds cry; hence he is called Ravana. The strength of the demon increased as per his wish; hence he always kept the gods afraid. | | | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रावणादिवरप्राप्तौ पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें रावण आदिको वरप्राप्तिविषयक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७५॥
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