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mahabharat 3.275.39: रावण, जो शक्ति से भरपूर था, अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकता था, यहाँ तक कि आकाश में भी विचरण कर सकता था। उसने राक्षसों और देवताओं पर आक्रमण किया और उनके सभी रत्न और रत्न चुरा लिए।   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.275.39 
दशग्रीवश्च दैत्यानां देवानां च बलोत्कट:।
आक्रम्य रत्नान्यहरत् कामरूपी विहङ्गम:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
रावण, जो शक्ति से भरपूर था, अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकता था, यहाँ तक कि आकाश में भी विचरण कर सकता था। उसने राक्षसों और देवताओं पर आक्रमण किया और उनके सभी रत्न और रत्न चुरा लिए।
 
Ravana, who was full of power, was capable of assuming any form he wished and even of moving in the sky. He attacked the demons and the gods and stole all the gems and precious stones they had.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)