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mahabharat 3.275.36: महाराज! विभीषण एक पुण्यात्मा पुरुष थे। वे सदैव धर्म के मार्ग पर चलते थे और अपने भाई कुबेर का अनुसरण करते थे; इसलिए उन्हें उत्तम धन-संपत्ति प्राप्त थी।   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.275.36 
विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां मार्गमनुस्मरन्।
अन्वगच्छन्महाराज श्रिया परमया युत:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! विभीषण एक पुण्यात्मा पुरुष थे। वे सदैव धर्म के मार्ग पर चलते थे और अपने भाई कुबेर का अनुसरण करते थे; इसलिए उन्हें उत्तम धन-संपत्ति प्राप्त थी।
 
Maharaj! Vibhishan was a virtuous person. He always followed the path of the virtuous and followed his brother Kubera; hence he was blessed with excellent wealth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)