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mahabharat 3.275.30: विभीषण बोले - हे प्रभु! यदि मुझ पर कोई बड़ी विपत्ति भी आ पड़े, तो भी मेरे मन में पाप का विचार कभी न उठे और ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की विधि तथा उसका परिणाम मुझे बिना सीखे ही बता दिया जाए।   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.275.30 
विभीषण उवाच
परमापद्‍गतस्यापि नाधर्मे मे मतिर्भवेत्।
अशिक्षितं च भगवन् ब्रह्मास्त्रं प्रतिभातु मे॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
विभीषण बोले - हे प्रभु! यदि मुझ पर कोई बड़ी विपत्ति भी आ पड़े, तो भी मेरे मन में पाप का विचार कभी न उठे और ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की विधि तथा उसका परिणाम मुझे बिना सीखे ही बता दिया जाए।
 
Vibhishan said - O Lord! Even if I face a great calamity, may the thought of sin never arise in my mind and may the method of using the Brahmastra and its conclusion be revealed to me without even learning it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)