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mahabharat 3.275.19: खर और शूर्पणखा दोनों ही सुखपूर्वक तपस्या में लीन थे और अपने भाइयों की सेवा और सुरक्षा कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.275.19 
खर: शूर्पणखा चैव तेषां वै तप्यतां तप:।
परिचर्यां च रक्षां च चक्रतुर्हृष्टमानसौ॥ १९॥
 
 
अनुवाद
खर और शूर्पणखा दोनों ही सुखपूर्वक तपस्या में लीन थे और अपने भाइयों की सेवा और सुरक्षा कर रहे थे।
 
Both Khar and Shurpanakha were happily engaged in penance and were serving and protecting their brothers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)