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mahabharat 3.275.18: उन्हें भी उपवास प्रिय था। बुद्धिमान और दानशील विभीषण सदैव मंत्र जपते थे। उन्होंने भी उस अवधि तक घोर तप किया था॥18॥   |   mahabharat अध्याय 3.275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 275: रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.275.18 
उपवासरतिर्धीमान् सदा जप्यपरायण:।
तमेव कालमातिष्ठत् तीव्रं तप उदारधी:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उन्हें भी उपवास प्रिय था। बुद्धिमान और दानशील विभीषण सदैव मंत्र जपते थे। उन्होंने भी उस अवधि तक घोर तप किया था॥18॥
 
He too loved fasting. The wise and generous Vibhishan always chanted mantras. He too did intense penance for that duration.॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)