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mahabharat 3.273.8: उसने कभी कोई पाप या निन्दित कार्य नहीं किया है। द्रौपदी ने ब्राह्मणों की सेवा और सत्कार रूपी महान धार्मिक कर्तव्य निभाए हैं ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 3.273: अपनी दुरवस्थासे दु:खी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 273: अपनी दुरवस्थासे दु:खी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.273.8 
न हि पापं कृतं किंचित् कर्म वा निन्दितं क्वचित्।
द्रौपद्या ब्राह्मणेष्वेव धर्म: सुचरितो महान्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उसने कभी कोई पाप या निन्दित कार्य नहीं किया है। द्रौपदी ने ब्राह्मणों की सेवा और सत्कार रूपी महान धार्मिक कर्तव्य निभाए हैं ॥8॥
 
She has never committed any sin or condemned act. Draupadi has performed great religious duties in the form of serving and honouring the Brahmins. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)