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श्लोक 3.273.12  |
अस्ति नूनं मया कश्चिदल्पभाग्यतरो नर:।
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत्॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| इसलिए मैं पूछता हूँ, क्या संसार में मेरे समान कोई दूसरा अभागा मनुष्य है अथवा क्या तुमने कभी मेरे समान अभागे मनुष्य को देखा या सुना है?॥12॥ |
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| Therefore I ask, is there any other person in the world as unfortunate as me or have you ever seen or heard of a person as unfortunate as me?॥ 12॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरप्रश्ने त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरप्रश्नविषयक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७३॥
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