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mahabharat 3.272.8: परन्तु मैं क्या करूँ? राजा युधिष्ठिर तो सदैव दयालु रहते हैं और आप भी अपनी बालबुद्धि के कारण मेरे ऐसे कार्यों में सदैव विघ्न डालते रहते हैं॥8॥   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.272.8 
किं नु शक्यं मया कर्तुं यद् राजा सततं घृणी।
त्वं च बालिशया बुद्धॺा सदैवास्मान् प्रबाधसे॥ ८॥
 
 
अनुवाद
परन्तु मैं क्या करूँ? राजा युधिष्ठिर तो सदैव दयालु रहते हैं और आप भी अपनी बालबुद्धि के कारण मेरे ऐसे कार्यों में सदैव विघ्न डालते रहते हैं॥8॥
 
But what can I do? King Yudhishthira always remains kind and you too, due to your childish mind, always create obstacles in my such works. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)