श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 78-80
 
 
श्लोक  3.272.78-80 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा नृपतिं सर्वपापहरो हर:।
उमापति: पशुपतिर्यज्ञहा त्रिपुरार्दन:॥ ७८॥
वामनैर्विकटै: कुब्जैरुग्रश्रवणदर्शनै:।
वृत: पारिषदैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतै:॥ ७९॥
त्र्यम्बको राजशार्दूल भगनेत्रनिपातन:।
उमासहायो भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! भगवान उमापति समस्त पापों के नाश करने वाले हैं। वे पशुओं के रक्षक, दक्ष यज्ञ के विध्वंसक और त्रिपुर के संहारक हैं। उनके तीन नेत्र हैं और उन्होंने ही भगदेवता के नेत्रों को नष्ट किया है। देवी उमा सदैव उनके साथ रहती हैं। हे राजनश्रेष्ठ! सिंधुराज जयद्रथ से उपर्युक्त वचन कहकर भगवान शिव अपने भयंकर दरबारियों के साथ वहाँ अन्तर्धान हो गए, जिनके कान और नेत्र भयानक थे और जो नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए थे, जिनमें बौने, कुबड़े और भयानक आकृति वाले प्राणी भी थे।'
 
Vaishampayana says, 'O Janmejaya! Lord Umapati is the destroyer of all sins. He is the protector of animals, the destroyer of Daksha Yagya and the destroyer of Tripura. He has three eyes and it is he who has destroyed the eyes of Bhagdevata. Goddess Uma always remains with him. O best of kings! Lord Shiva, after saying the above words to Sindhuraj Jayadratha, disappeared there along with his fierce courtiers, who had terrible ears and eyes and were carrying various weapons, among whom were dwarfs, hunchbacks and creatures with terrible features. 78-80.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)