श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.272.7 
भीमसेन उवाच
नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुमर्हति।
कृष्णायास्तदनर्हाया: परिक्लेष्टा नराधम:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन ने कहा, 'इस दुष्ट ने द्रौपदी को कष्ट दिया है, जो कष्ट देने योग्य नहीं थी; इसलिए मेरे लिए यह उचित नहीं है कि मैं इस पापी जयद्रथ को जीवित रहने दूँ।'
 
Bhimasena said, 'This wretch has hurt Draupadi, who was unworthy of being troubled; therefore, it is not right for me to let this sinful Jaydratha live.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)