श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.272.63 
दुर्दिनाम्भोदसदृशो दीप्ताक्षो वामनाकृति:।
दण्डी कमण्डलुधर: श्रीवत्सोरसि भूषित:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
उनका रंग वर्षा ऋतु के मेघ के समान श्याम था। उनकी आँखें चमक रही थीं। वे वामन रूपी थे, उनके हाथ में एक दंड और एक जलपात्र था। उनकी छाती पर श्रीवत्स का चिन्ह सुशोभित था।
 
‘He was dark in complexion like a rainy season cloud. His eyes were shining. He was Vamana shaped, held a staff and a water pot and was adorned with the mark of Shrivatsa on his chest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)