श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.272.6 
सरोषं भीमसेनं तु वारयामास फाल्गुन:।
दु:शलाया: कृते राजा यत् तदाहेति कौरव॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इतने पर भी भीमसेन का क्रोध शांत न हुआ। यह देखकर अर्जुन ने उन्हें रोकते हुए कहा - 'कुरुपुत्र! कृपया दु:शला के वैधव्य को ध्यान में रखते हुए महाराज द्वारा दी गई आज्ञा का भी विचार करो।'॥6॥
 
Even after this Bhimasena's anger did not subside. Seeing this Arjuna stopped him and said - 'Son of Kuru! Please also think about the orders given by Maharaja keeping in mind the widowhood of Dushala'॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)