श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.272.58-59 
शूलोद्यतकर: स्रग्वी हिरण्यकशिपुस्तदा॥ ५८॥
मेघस्तनितनिर्घोषो नीलाभ्रचयसंनिभ:।
देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
'उनके एक हाथ में भाला था। उनके गले में पुष्पों की माला शोभायमान थी। उस समय मेघ की गर्जना के समान वाणी वाले, नीले बादलों के समान श्यामवर्णी, दिति के गर्भ से उत्पन्न तथा देवताओं के शत्रु महापराक्रमी हिरण्यकशिपु ने भगवान नृसिंह पर आक्रमण किया।' 58-59
 
‘He held a spear in one hand. A garland of flowers adorned his neck. At that time the valiant Hiranyakashipu, whose voice was like the roar of a cloud, who was dark like a mass of blue clouds and who was born from the womb of Diti and had become the enemy of the gods, attacked Lord Narasimha. 58-59.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)