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mahabharat 3.272.53-54: वेदों के समान वैदिक साहित्य में भगवान ने वराह रूप धारण कर जल में प्रवेश किया। उनका विशाल पर्वताकार शरीर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा था। उनके दाँत अत्यंत तीखे थे। उनका शरीर चमक रहा था। भगवान की वाणी विशाल बादलों की गर्जना के समान गम्भीर थी। उनका शरीर नीले जल के समान श्याम वर्ण का था। 53-54   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  3.272.53-54 
कृत्वा वराहवपुषं वाङ्मयं वेदसम्मितम्।
दशयोजनविस्तीर्णमायतं शतयोजनम्॥ ५३॥
महापर्वतवर्ष्माभं तीक्ष्णदंष्ट्रं प्रदीप्तिमत्।
महामेघौघनिर्घोषं नीलजीमूतसंनिभम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वेदों के समान वैदिक साहित्य में भगवान ने वराह रूप धारण कर जल में प्रवेश किया। उनका विशाल पर्वताकार शरीर सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा था। उनके दाँत अत्यंत तीखे थे। उनका शरीर चमक रहा था। भगवान की वाणी विशाल बादलों की गर्जना के समान गम्भीर थी। उनका शरीर नीले जल के समान श्याम वर्ण का था। 53-54
 
‘Vedic literature equivalent to Vedas Lord entered the water in the form of Varaha. His huge mountainous body was a hundred yojanas long and ten yojanas wide. His teeth were very sharp. His body was glowing. Lord's voice was deep like the roar of great clouds. His body was as dark as the blue water. 53-54.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)