श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.272.52 
एवं संचिन्त्य मनसा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा।
जलक्रीडाभिरुचितं वाराहं रूपमस्मरत्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मन में विचार करने के बाद उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा कि वराह का रूप ही जल में क्रीड़ा करने के लिए उपयुक्त है; अत: उन्होंने उस रूप का स्मरण किया।
 
After contemplating in this manner in his mind, he saw with divine sight that the form of Varaah was the one suitable for playing in the water; therefore, he remembered that form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)