श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  3.272.49-50 
जलेन समनुप्राप्ते सर्वत: पृथिवीतले।
तदा चैकार्णवे तस्मिन्नेकाकाशे प्रभुश्चरन्॥ ४९॥
निशायामिव खद्योत: प्रावृट्काले समन्तत:।
प्रतिष्ठानाय पृथिवीं मार्गमाणस्तदाभवत्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
'सम्पूर्ण पृथ्वी चारों ओर से जलमग्न थी। उस समय भगवान् समुद्र से आच्छादित एकमात्र आकाश में पृथ्वी की खोज में विचरण कर रहे थे, जैसे वर्षा की रात्रि में जुगनू चारों ओर उड़ते हैं। वे पृथ्वी को कहीं स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए उसे खोज रहे थे। ॥49-50॥
 
‘The entire earth was submerged in water from all sides. At that time, God was roaming in the only sky covered by the ocean in search of the earth, just like a firefly flies around in all directions during the rainy night. He was searching for the earth in order to place it somewhere permanently. ॥ 49-50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)