श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  3.272.44-45 
ततश्चतुर्मुखो ब्रह्मा नाभिपद्माद् विनि:सृत:।
तत्रोपविष्ट: सहसा पद्मे लोकपितामह:॥ ४४॥
शून्यं दृष्ट्वा जगत् कृत्स्नं मानसानात्मन: समान्।
ततो मरीचिप्रमुखान् महर्षीनसृजन्नव॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उस नाभिकमलसा से चतुर्मुख ब्रह्माजी प्रकट हुए। उस कमल पर बैठकर ब्रह्माजी ने अचानक सम्पूर्ण जगत् को शून्य देखकर अपने मानस पुत्रों के रूप में मरीचि आदि अपने समान प्रभावशाली नौ महर्षियों को उत्पन्न किया। 44-45॥
 
From that Nabhikmalsa, four-faced Brahmaji emerged. Sitting on that lotus, Lord Brahma suddenly seeing the entire world void, created nine great sages like Marichi and others as influential as himself in the form of his mental sons. 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)