श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.272.41 
सत्त्वोद्रेकात् प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमपश्यत।
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर सृष्टिकाल में सत्त्वगुण की अधिकता के कारण भगवान योगनिद्रा से जागे। जब वे जागे तो उन्होंने सम्पूर्ण जगत को सूना पाया। महर्षिगण भगवान नारायण के सम्बन्ध में यहाँ इस श्लोक का उदाहरण देते हैं-॥41॥
 
After that, during the time of creation, due to the abundance of Sattva guna, God woke up from yoga sleep. When he woke up, he found the entire world deserted. Maharshigan gives the example of this verse here in relation to Lord Narayan -॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)