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mahabharat 3.272.33: 'तब वे पाताल लोक में विचरण करने वाले सर्पों का भी नाश कर देते हैं।' जब काली अग्नि से सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब आकाश में अनेक रंगों वाला एक विशाल बादल छा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.272.33 
निर्दहन्नागलोकांश्च पातालतलचारिण:।
अथान्तरिक्षे सुमहन्नानावर्णा: पयोधरा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
'तब वे पाताल लोक में विचरण करने वाले सर्पों का भी नाश कर देते हैं।' जब काली अग्नि से सब कुछ नष्ट हो जाता है, तब आकाश में अनेक रंगों वाला एक विशाल बादल छा जाता है।
 
‘Then they destroy even the serpents roaming in the netherworld. When everything is destroyed by the black fire, a huge cloud of many colours gathers in the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)