श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.272.30 
अजितं सर्वलोकानां देवैरपि दुरासदम्।
मया दत्तं पाशुपतं दिव्यमप्रतिमं शरम्।
अवाप लोकपालेभ्यो वज्रादीन् स महाशरान्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'तुम ही नहीं, सम्पूर्ण लोक मिलकर भी उसे परास्त नहीं कर सकते। देवताओं के लिए भी उसका सामना करना कठिन है। मैंने उसे पाशुपत नामक दिव्यास्त्र प्रदान किया है, जिसकी कोई बराबरी नहीं है। इसके अतिरिक्त उसे अन्य लोकपालों से वज्र आदि महान् अस्त्र भी प्राप्त हुए हैं॥30॥
 
‘Not only you, even the entire world together cannot defeat him. It is difficult even for the gods to face him. I have given him a divine weapon called Pashupat, which has no equal. Apart from this, he has also received great weapons like Vajra etc. from other Lokpalas.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)