श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 24-26
 
 
श्लोक  3.272.24-26 
एवमुक्तस्तु सव्रीडं तूष्णीं किंचिदवाङ्मुख:॥ २४॥
जगाम राजन् दु:खार्तो गङ्गाद्वाराय भारत।
स देवं शरणं गत्वा विरूपाक्षमुमापतिम्॥ २५॥
तपश्चचार विपुलं तस्य प्रीतो वृषध्वज:।
बलिं स्वयं प्रत्यगृह्णात् प्रीयमाणस्त्रिलोचन:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजन! युधिष्ठिर की यह बात सुनकर जयद्रथ अत्यन्त लज्जित हुआ और सिर झुकाकर चुपचाप वहाँ से चला गया। जनमेजय! उसे पराजय का महान् दुःख हो रहा था, इसलिए वह वहाँ से घर न जाकर गंगाद्वार (हरिद्वार) चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने त्रिनेत्रधारी भगवान उमापति की शरण ली और घोर तपस्या की। इससे भगवान शंकर प्रसन्न हुए। त्रिनेत्रधारी महादेव ने स्वयं दर्शन देकर उसकी पूजा स्वीकार की। 24-26
 
King! On hearing Yudhishthira say this, Jayadratha felt very ashamed and went away from there quietly with his head bowed. Janamejaya! He was suffering from great sorrow of being defeated; therefore, instead of going home from there, he went to Gangadwar (Haridwar). On reaching there, he took refuge in the three-eyed Lord Umapati and performed great penance. This pleased Lord Shankar. The three-eyed Mahadev himself gave darshan and accepted his worship. 24-26.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)