श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 22-24h
 
 
श्लोक  3.272.22-24h 
गतसत्त्वमिव ज्ञात्वा कर्तारमशुभस्य तम्॥ २२॥
सम्प्रेक्ष्य भरतश्रेष्ठ: कृपां चक्रे नराधिप:।
धर्मे ते वर्धतां बुद्धिर्मा चाधर्मे मन: कृथा:॥ २३॥
साश्व: सरथपादात: स्वस्ति गच्छ जयद्रथ।
 
 
अनुवाद
यह देखकर और समझकर कि पापकर्म करने वाला जयद्रथ मरणासन्न है, भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने उस पर दया करके कहा, 'तुम्हारी बुद्धि धर्म में ही बढ़ती रहे, अधर्म में कभी मन न लगाना। जयद्रथ! अपने रथ, घोड़ों और पैदल सैनिकों के साथ सकुशल जाओ।'
 
Seeing and understanding that Jaydrath, who had committed an evil deed, was almost dead, the best of the Bharatas, King Yudhishthira, took pity on him and said, 'May your wisdom keep increasing in Dharma, never give your mind to Adharma. Jaydrath! Go safely with your chariot, horses and infantry.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)