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mahabharat 3.272.19: राजन ! तब जयद्रथ बंधन से मुक्त हो गया। वह व्याकुल होकर राजा युधिष्ठिर के पास गया और उन्हें प्रणाम करके, वहाँ अन्य ऋषियों को भी बैठे देखकर, उनके चरणों पर सिर नवाया ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 3.272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.272.19 
स मुक्तोऽभ्येत्य राजानमभिवाद्य युधिष्ठिरम्।
ववन्दे विह्वलो राजंस्तांश्च दृष्ट्वा मुनींस्तदा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
राजन ! तब जयद्रथ बंधन से मुक्त हो गया। वह व्याकुल होकर राजा युधिष्ठिर के पास गया और उन्हें प्रणाम करके, वहाँ अन्य ऋषियों को भी बैठे देखकर, उनके चरणों पर सिर नवाया ॥19॥
 
Rajan! Then Jayadratha was freed from bondage. He, distraught, went to King Yudhishthir and after paying obeisance to him, seeing other sages also sitting there, he bowed his head at his feet. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)