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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 272: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.272.1 
वैशम्पायन उवाच
जयद्रथस्तु सम्प्रेक्ष्य भ्रातरावुद्यतावुभौ।
प्राधावत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सु: सुदु:खित:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! भीम और अर्जुन दोनों भाइयों को अपने वध पर तुले हुए देखकर जयद्रथ अत्यन्त दुःखी हुआ और अपनी घबराहट छोड़कर प्राण बचाने के लिए तुरन्त ही बड़े वेग से भागने लगा॥1॥
 
Vaishmpayana says - 'O Janamejaya! On seeing both the brothers Bhima and Arjuna bent upon killing him, Jayadratha became very sad and leaving behind his nervousness, he immediately started running at a great speed to save his life.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)