श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 271: पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.271.58-59 
अनेन वीर्येण कथं स्त्रियं प्रार्थयसे बलात्॥ ५८॥
राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलायनम्।
कथं ह्यनुचरान् हित्वा शत्रुमध्ये पलायसे॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
राजकुमार! लौट आओ, तुम्हारा भागना उचित नहीं है। शत्रुओं के बीच में अपने सेवकों को छोड़कर तुम कैसे भाग रहे हो? क्या इसी कारण तुम परस्त्री का बलपूर्वक हरण करना चाहते थे?॥58-59॥
 
‘Prince! Come back, it is not appropriate for you to run away. How are you running away leaving your servants in the midst of the enemies? Was this the reason you wanted to abduct another man's wife by force?'॥ 58-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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