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mahabharat 3.271.57-58h: अब तो उसे केवल भागने का ही उत्साह था, अतः वह वन की ओर भागा। सिन्धुराज को केवल भागने में ही अपना पराक्रम दिखाते देख, बलवान अर्जुन ने उसका पीछा करते हुए कहा-॥57 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.271: पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 271: पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  3.271.57-58h 
पलायनकृतोत्साह: प्राद्रवद् येन वै वनम्।
सैन्धवं त्वभिसम्प्रेक्ष्य पराक्रान्तं पलायने॥ ५७॥
अनुयाय महाबाहु: फाल्गुनो वाक्यमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
अब तो उसे केवल भागने का ही उत्साह था, अतः वह वन की ओर भागा। सिन्धुराज को केवल भागने में ही अपना पराक्रम दिखाते देख, बलवान अर्जुन ने उसका पीछा करते हुए कहा-॥57 1/2॥
 
Now he had only the enthusiasm to run away, so he ran towards the forest. Seeing Sindhuraj showing his prowess only in running away, the powerful Arjuna chased him and said -॥ 57 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)