श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 271: पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.271.44 
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा द्रौपदी भीममुवाच व्याकुलेन्द्रिया।
कुपिता ह्रीमती प्राज्ञा पती भीमार्जुनावुभौ॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! युधिष्ठिर की यह बात सुनकर द्रौपदी की समस्त इन्द्रियाँ चंचल हो उठीं। लज्जाशील और बुद्धिमान होने पर भी वह क्रोधित होकर अपने दोनों पतियों भीमसेन और अर्जुन से बोली-
 
Vaishampayana says- Janamejaya! On hearing this from Yudhishthira, all the senses of Draupadi became restless. Despite being shy and intelligent, she became angry and said to both her husbands Bhimasena and Arjuna-
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas