श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 271: पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.271.38 
तमेवान्विष भद्रं ते किं ते योधैर्निपातितै:।
अनामिषमिदं कर्म कथं वा मन्यते भवान्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
भैया, आप जयद्रथ को ही खोजिए। इन (निर्दोष) सैनिकों को मारने से क्या लाभ? यह कार्य व्यर्थ प्रतीत होता है। अथवा आप इसे क्या समझते हैं?॥38॥
 
Brother, may you search for Jayadratha only. What is the use of killing these (innocent) soldiers? This act appears to be futile. Or how do you think of it?॥ 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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