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श्लोक  3.27.7 
चतुर्णामेव पापानामस्रं न पतितं तदा।
त्वयि भारत निष्क्रान्ते वनायाजिनवाससि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
भरत! जब आप छाल के वस्त्र पहनकर वन को चले थे, तब केवल चार पापियों की आँखों से आँसू नहीं निकले थे।
 
Bhaarat! When you left for the forest wearing bark clothes, only four sinners' eyes did not shed tears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)