श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.27.6 
सुखोचितमदु:खार्हं दुरात्मा ससुहृद्‍गण:।
ईदृशं दु:खमानीय मोदते पापपूरुष:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तुम सुख भोगने के अधिकारी हो। तुम कभी दुःख भोगने के योग्य नहीं हो। फिर भी तुम्हें ऐसे दुःख में डालकर वह पापी दुष्टात्मा अपने मित्रों के साथ आनन्द मना रहा है ॥6॥
 
You deserve to experience happiness. You are never worthy of suffering. Yet by putting you into such suffering, that sinful evil soul is rejoicing with his friends. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)