श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.27.5 
आयसं हृदयं नूनं तस्य दुष्कृतकर्मण:।
यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावयत् तदा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही उस दुष्ट का हृदय लोहे का बना हुआ है, क्योंकि उस समय उसने आप जैसे महान् एवं धर्मात्मा पुरुष के प्रति भी कठोर वचन कहे थे ॥5॥
 
Surely that evil-doer's heart is made of iron, because at that time he had spoken harsh words even to a great and pious man like you. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)