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mahabharat 3.27.4: महाराज! उस नीच बुद्धि वाले दुष्टात्मा ने आपको मृगचर्म पहनाकर मेरे साथ वन में भेज दिया; परन्तु उसे इसका तनिक भी पश्चाताप नहीं हुआ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.27.4 
यस्त्वां राजन् मया सार्धमजिनै: प्रतिवासितम्।
वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नान्वतप्यत दुर्मति:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस नीच बुद्धि वाले दुष्टात्मा ने आपको मृगचर्म पहनाकर मेरे साथ वन में भेज दिया; परन्तु उसे इसका तनिक भी पश्चाताप नहीं हुआ॥4॥
 
Maharaj! That evil soul with a mean mind made you wear a deerskin and sent you to the forest with me; but he did not feel even a little remorse for this. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)