Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.27.37: संसार में कोई भी क्षत्रिय क्रोध से रहित नहीं है। क्षत्रिय शब्द की व्युत्पत्ति ही यह सूचित करती है कि वह क्रोध से युक्त है।* परंतु आज आप जैसे क्षत्रियों में यह क्रोध का अभाव मुझे क्षत्रियत्व के प्रतिकूल प्रतीत होता है ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 3.27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.27.37 
न निर्मन्यु: क्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम्।
तदद्य त्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
संसार में कोई भी क्षत्रिय क्रोध से रहित नहीं है। क्षत्रिय शब्द की व्युत्पत्ति ही यह सूचित करती है कि वह क्रोध से युक्त है।* परंतु आज आप जैसे क्षत्रियों में यह क्रोध का अभाव मुझे क्षत्रियत्व के प्रतिकूल प्रतीत होता है ॥37॥
 
No Kshatriya in the world is devoid of anger. The etymology of the word Kshatriya itself indicates that he is full of anger.* But today, in Kshatriyas like you, this lack of anger appears to me to be contrary to Kshatriyahood. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)