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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन
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श्लोक 33-34h
श्लोक
3.27.33-34h
नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दु:खितावुभौ॥ ३३॥
अदु:खार्हौ मनुष्येन्द्र कस्मान्मन्युर्न वर्धते।
अनुवाद
नरेन्द्र! नकुल और सहदेव दुःख के योग्य नहीं हैं। आज उन दोनों को दुःखी देखकर तुम्हारा क्रोध क्यों नहीं बढ़ रहा है?॥33 1/2॥
Narendra! Nakul and Sahadev are not worthy of suffering. Why is your anger not increasing on seeing them both in sorrow today?॥ 33 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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