श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  3.27.32-33h 
दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर॥ ३२॥
सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मात् क्षमसि पार्थिव।
 
 
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर! माद्री के परम सुन्दर और पराक्रमी पुत्र सहदेव को वनवास का दुःख भोगते देखकर आप शत्रुओं को किस प्रकार क्षमा कर रहे हैं?॥ 32 1/2॥
 
Maharaja Yudhishthira! How are you forgiving the enemies after seeing Madri's most handsome and valiant son Sahadeva suffering the pain of exile?॥ 32 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)