श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 27: द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  3.27.31-32h 
श्यामं बृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे॥ ३१॥
नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते।
 
 
अनुवाद
ढाल और तलवार से लड़ने वाले योद्धाओं में श्रेष्ठ, लम्बे कद वाले और श्यामवर्णी युवक नकुल को आज वन में कष्ट सहते देखकर आप क्रोधित क्यों नहीं होते? ॥31 1/2॥
 
Why are you not angry when you see Nakul, who is the best among the warriors fighting with shield and sword, who is of tall stature and who is a dark-skinned youth, suffering in the forest today? ॥31 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)